09/11/2010

कुछ करने की कोई वजह नहीं है
सोचने को कुछ बचा नहीं है
एक कोने में खाली जूते पड़े है
दीवारो पर टकटकी लगाये आँखें थक चुकी है
सोये हुए हाथ लटककर ज़मीन की ओर इशारा करते है
उंगलियो से आँखें मसलता हूँ तो कुर्सी शोर करती है
बस कभी कभी कुछ गा लेता हूँ
एड़ी ज़मीन पर रख कर पैर हिला लेता हूँ
बिना कुछ सोचे बिना कुछ समझे
वो बात ही अलग होती है