05/08/2010

सुबह ले रही अंगड़ाइयाँ
और चाय भी उबल उबल कर
खुद ही को पी रही
अब कोई फिक्र नहीं
कोई ग़म भी नहीं
हर जगह बस
धुआ मचल रहा
हसते हसते क्यू
बस मैं धुआ निगल रहा
समय भी थक चुका है अब तो
घड़ियाँ भी हांफ़ने लगी
कहा चले जा रहा बेवजह
मुझसे है कह रही
साल निकल जाते है
लगता है कल ही की बात है
पता नहीं चलता यहाँ
दिन है या रात है
कोई आवाज़ नहीं
कोई रास्‍ता नहीं
गुज़रे हुए कल से
अब कोई वास्ता नहीं
कुछ कहानियाँ है बस पास में
कुछ कहने की आस में
और गीत भी है भूखे
कानो की प्यास में
कुछ खयाल भी है डरे हुए
कहीं सहमे कुछ मरे हुए
दरवाज़ो की तलाश में
कोई मिल जाता है कभी कभी
कहानियाँ सुनाने को
नहीं मिलता अगर
तो खुद ही को सुना लेता हू
हाथ पैर तो सुन हैं
बस सपने है दौड़ाने को
कहाँ कहाँ ले आते हैं
जहाँ सपनो में भी
सपने आते है
धुए की बूँदो
में सोया रेहता हु
हर समय इन सपनो में ही
खोया रेहता हु